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15 November 2011

दिल्ली के दिल

दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे,
नज़रों में बसे जंगल,
अब कंक्रीट में बदल रहे.

दूर तक जातीं ये,
चौड़ी-लंबी सड़कें,
सफर को ख़ूब हैं,
मंज़िल को पहुँचाना छोड़ रहे.

दोस्तों के हो-हल्ले,
नातेदारों के मोहल्ले,
साथ आने को तरस रहे,
इक-दूजे को हाल पर छोड़ रहे.

दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे...

आ मेरी जां!!

वहां नज़रों से बात निकली थी,
यहां धड़कनों ने कान खोल लिए,
बात अपनी तो बन ही जानी थी,
गुलों ने महक के राज़ खोल दिए!

वहां इकरारे-मोहब्बत हो ही जानी थी,
यहां वादा-ए-निबाही भी हमकदम हो लिए,
साज़े-ए-वफ़ा को बज ही जाना था,
सुरों ने छिड़ के राग बोल दिए!

वहां नज़रों से बात निकल गई,
यहां वो धड़कनों में जज़्ब हुई,
अब इस साथ से चमन गुलज़ार करें,
आ मेरी जां,
चश्मे-निगाही से तसव्वुरे-जानां करें!

आ मेरी जां!!

16 September 2011

पापा...

आज आठ साल पूरे हो गए, लेकिन अब भी यकीन नहीं होता पापा!! हाँ, ज़िन्दगी एक पल के लिए भी थमी नहीं... चल रही है और हम सब उसके पीछे-पीछे चलते जा रहे हैं... उस खालीपन के एहसास को साथ लिए हुए... आपकी बहुत याद आती है पापा !!!

08 August 2011

8 march, mahila divas

ek baat aaj dekhi, mahila ho to pati ka naam, bacche hain to kitne, yaadgaar tarikh ke sawaal per shaadi kis din hui jaise sawal hi saamne rakh diye jate hain, ab bhi..
bas ho gaya mahila hone ki farz-adayegi !!!
Kya iske aalava, AAJ BHI mahila ke astitva ke saath aur sawaal nahin jud sakte ???
Khair 100 hon ya hazaar saal, lagta hai astitva kisi choukhate main baanda huaa hi rahega...

१६ अप्रैल, इलाहाबाद यात्रा के बाद...

कल का तो पता नहीं, आज अँधेरा तारी है,
उस सितमगर के करम से, दिल छलनी मन भारी है...

बिछुड़े दोस्तों के नाम!!

जो बिछुड़ गए वो दोस्त पुराने,
गुज़रे वक्त के वो याराने याद आते हैं,
बेतकल्लुफ़ी वो चुहलबाज़ी,
फिर इसरार कर मनाने याद आते हैं.

पलों में गुज़र गए वो ज़माने,
एहसासों में जज़्ब वो अपनापे,
अब ना वो दोस्त रहे ना वो याराने,
बस यादों में बसे वो मंज़र याद आते हैं.

काश! कोई राह उस ओर को खुल जाती,
तो दौड़ जाते उसी सरमाए की ओर,
जहाँ बीता था बचपन का कुछ वक्त,
जिससे जुड़े हर वाकये याद आते हैं.

साथ मिल-बैठ वो गप्प लगाना, हंसना-हंसाना औ रूठ जाना,
सवालों के छोर पकड़ते-पकड़ते,
एक-दूजे का हमसाया हो जाना,
बिछुड़ गए वो दोस्त अब भी याद आते हैं.

गुज़र गया वक्त पर,
वो यार पुराने अब भी याद आते हैं.

गुज़रा वक्त लौट नहीं आता,
बिछुड़ा कोई मिल नहीं पाता,
फिर भी यादों के इन मनकों से,
ज़िन्दगी की माला पिरोते हैं.

बिछुड़ गए वो दोस्त अब भी याद आते हैं...

23 June 2011

तपिश के बाद

दूर आसमां तले कोई, तिनका-तिनका शाम छिटकाटा रहा,
जो रात गहरा गई, उठ तारों में लुका-छिपी खेलता रहा...

अलस्सुबह दौड़ सूरज को थाम लाया वोही, दिन चढे फिर फूँक मान-मार दुपहर बुझाई,
लो सूप लिए फिर वोही शाम छिटकाटा रहा, तपिश के बाद ठंडी हवा की तहान खोलता रहा...

18 May 2011

कल तक ख़बरों में पढ़ा करते थे आज अपने घर पर भी बीत गई.

इतवार की रात एक कैब में लिफ्ट लेने के बाद भाई पर घेर कर हमला किया गया और सबकुछ लूट लिया. पी सी आर वेन के सामने से गुजरने और मदद के लिये आवाज़ देने पर भी कोई मदद नहीं मिली. अपनी ही सोसाइटी के सामने की सड़क से ले जाकर कोई २० किलोमीटर दूर फेंक कर गाड़ी पीछे कर उनके पैर पर चढाने की कोशिश भी की गई. भाई तो अँधेरे में भी किसी तरह फुटपाथ पर कूद कर बच गए और चोटिल हालत में बिना मदद मिले आधी रात में पैदल घर पहुंचे. घर में सभी ने शुक्र मनाया कि उन गुंडों ने जान बख्श दी.

एन सी आर में रहने वालों के साथ जब पुलिस ऐसा बर्ताव करती है तो बाकी जगहों का क्या हाल होगा, सोच कर रूह कांपी जा रही है.

दोस्तो, बहुत संभल कर रहिये!! कोई पुलिस-वुलिस नहीं है यहाँ. सब 'राम भरोसे हिन्दू होटल' वाला आलम है!!

28 April 2011

कोई कुछ कहता नहीं फिर भी एक आवाज़ आती है,
चल फिर कोई ठौर ढूँढ तेरा अब यहाँ आबो-दाना नहीं...

26 March 2011

अभी एक बात सुनी,
जीतने के लिया हर ओर ध्यान देना ज़रूरी होता है.
शायद ध्यान की कमी हार का सामना कराती है. लेकिन अगर हार की आदत पड़ जाए तो भी ठीक नहीं होता. किसी को कुछ ना कहना दब्बू जतलाता है. जीतना है तो हर ओर नजर रखो. हर एक की हरकत को समझो...

27 February 2011

...ऐ दर्द...

हर दर्द में तेरा एहसास रहता था,
तू होगा कोई ख्वाब ये खयाल रहता था,
आज जब साँस लेने पर भी दर्द उठा,
तू सच मेरे पास है, इससे इतेफाक हुआ.
...ऐ दर्द...

21 February 2011

कुछ भी नहीं...

बात कुछ थी और, बात फकत कुछ भी नहीं,
मेरी औकात कुछ नहीं, और मेरी पहचान...
कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...

तुम थे तो बात कुछ हो जाती,
अब सन्नाटे में आवाज...
कुछ भी नहीं.. कुछ भी नहीं...

साथ कोई होता तो हमकदम हो जाता,
इस भीड़ में जज्बातों का मोल,
कुछ नहीं... कुछ भी तो नहीं...

भीड़ के बीच इक शक्ल कभी उभर आती है,
लोग पहचान लें तो हंसी बड़ी आती है,
गर्दो-गुबार के हांथ भी कुछ लग जाता है जहाँ,
मेरे हांथों में वहीँ कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...

http://www.srijangatha.com/?pagename=Pustkayan_20Jan2011

http://www.srijangatha.com/?pagename=Pustkayan_20Jan2011

01 January 2011

यूं ही!

एक विचार आया आज, अक्सर हमारे साथ ऐसा होता है कि जो घटनाएँ कहीं नहीं घटतीं, उनके बारे में सोच-सोच कर हमारा मन परेशान रहता है और हम सबको कहीं सहज नहीं रहने देता.
पता है ये क्या है... ये है हमारे अपने मन का, अपना मनोरंजन आप करने का एक अनूठा ही तरीका. हींग लगे ना फिटकरी, और रंग चोखा का चोखा...
इतनी सी बात समझने में हमलोगों को कितनी माथापच्ची करनी पड़ती है ना...
तो मनवा किसी की ना सुन, बस अपनी मनमानी कर और उसका मज़ा चख.

काश कि...

काश कि सपने सच होते, काश कि अपने सब होते,
काश कि मंजिल पा लेती, फिर खो जाती नए सपनों में...

काश कि हर नज़र को, सपन नया कोई दिख जाता,
काश कि हर सपन को, उसकी डगर कहीं मिल जाती...

काश कि तुम पास होते, काश कि मैं कुछ कह पाती,
काश कि बिन बोले ही, तुम तक बात पहुँच जाती...

काश कि ऐसा हो जाता, तो मैं भी कुछ ठहर पाती,
कुछ देर किसी ठौर पर, कुछ पल सुख के जी पाती... काश कि...