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20 February 2016

तुम्हारी यादों को शब्दांजलि

आज फिर 20 फरवरी है. इस दिन की पास आती आहट भी आहत करने लग जाती है बड़े दादा! उस दिन क्या गुज़रा था और कैसे, सब आँखों के सामने डोल जाता है.

लेकिन आज सुबह से - बोगनबेलिया से झरते फूलों का दिखना, तुम्हारी पसंदीदा चन्दन दास की गाई इस ग़ज़ल का रेडियो पे बजना,
"इस सोच में बैठा हूँ क्या गम उसे पहुंचा है, बिखरी हुई जुल्फें हैं उतरा हुआ चेहरा है",
अपने किये कामों में तुम्हारे तरीके का झलकना हमें यह बता ही गए कि तुम हो, अब भी यहीं कहीं मौजूद हो!
बड़ा लम्बा वक्त हो गया है बड़े दादा किसी से दिल खोल के बात किये हुए... कोशिश तो कई बार की, लेकिन जिस तरह तुम मेरी बातें सुनते, उनमें अपनी बात जोड़ते जाते थे और हमदोनों घंटों बतियाया करते थे वैसा कोई नहीं करता... शायद कोई कर ही नहीं सकता!
"जिस फूल को तितली ने चूमा मेरी जानिब से, ज़ालिम ने उस कली को मसला नहीं रौंदा है"
 तुम थे तो था हमारा सबसे अहम रहबर, दोस्त,आलोचक और प्रेरक... जो कुछ और ज्यादा, कुछ और बेहतर, कुछ बढ़कर करने के लिए जोश दिलाता रहता था! ...अब इस सन्नाटे और अकेले में जब तुम्हारे होने के एहसास पर खालीपन हावी होने लगा है तो बस तुम्हारी यादों का ही सहारा होता है और तुम्हारी कही बातें, जो फिर कुछ करने का हौसला देतीं रहती हैं.
"हालाँ के पुकारा था तुम ही ने मुझे लेकिन, महसूस हुआ जैसे कोयल ने पुकारा है"
अभी हाल में ही बड़े पापा भी इस फ़ानी दुनिया से बिदा होकर चले गए. और उनसे अपनी आख़िरी मुलाकात और उनका किया "देहदान" ज़िंदगी की किताब में एक नया पन्ना जोड़ गए. बहुत सी यादें हैं जिनमें तुम थे और थे बड़े पापा! दोनों ही मेरी हिम्मत के अहम सम्बल रहे हैं. अब भी हैं दादा, आप दोनों की यादें और आपलोगों से की बातों के ज़रिये मिला जीने का फलसफ़ा!
"मुड़ कर भी नहीं देखा झोंकों की तरह उस ने, वो मेरे बराबर से हँसता हुआ गुज़रा है"
वक्त के साथ सभी का साथ छूटता ही है, लेकिन यादों का साथ तो अपनी सांसों का साथी होता है न दादा!
आज की तारीख को अब मनहूस भी तो नहीं कह सकते, तारीख न तो खुशनुमा होती है न मनहूस, वो तो उससे जुड़ी यादें उसे हमारे लिए ऐसा बना दिया करती हैं. इन दो सालों में तुम्हारे बाद की इस दुनिया के कई रंग देखे और शायद कई देखने बाकी भी होंगे. बस एक बात आज और कहेंगे बड़े दादा, तुम्हारे अचानक चले जाने ने बहुत अकेला कर दिया हमें, लेकिन तुम्हारी बातों का इतना बड़ा ख़ज़ाना मेरे पास है कि ख़ुद की समझ के बढ़ने के साथ उनके नए-नए मायने सामने आते जायेंगे और हम उनमें तुम्हारा साथ पा जायेंगे :)
आज के दौर में जब इकलौते बच्चे हुआ करते हैं, या सबके भाई हों यह भी निश्चित बात नहीं तो ऐसे में तुमको अपने बड़े दादा के तौर पे पाना, अब लगता है कि किसी दुआ से कम नहीं था दादा!
तुमसे हम ऐसे ही बात किया करेंगे दादा, दिल खोलकर बातें, तुम सुन रहे हो न दादा!!

5 comments:

  1. कुछ कहने का मन कर रहा है लेकिन शब्दों की कमी सी लग रही है.
    फिर भी अपनी बात को तुमने अच्छे से कह दिया .... और दादा की आदत रही है की वह सबकी बात अच्छे से सुनते थे और सुन भी रहे होगे। हाँ वह बात अलग है की उनको अपनी बात कहने के लिए फ़रिश्ते रख लिए होंगे।
    बस इतना ही ........ दादा को शत शत नमन!

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    1. शुक्रिया भाई। हाँ उनकी यादें ही साथ हैं हमसब के!

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  2. ना रोकता तुझे न करता ज़िद साथ चलने की !
    जाने वाले मगर एक बार तो मुड़ के देखा होता !!

    - " तन्हा " !!
    20-02-2016

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    1. किरदार था कोई, हंसता-हैंसता चला भी गया;
      हम उसके बाद, उस्का जाना तकते रह गए।

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    2. अजर अमर है ये रूह ....
      बदल लेती है ये तन रूपी वस्त्र ;

      बदल जाती है हस्ती
      एक यादों के रूप में
      कुछ खट्टी ~ कुछ मीठी ~ !

      एहसास में बदल जाती है
      मौजूदगी और गैर मौजूदगी भी ;

      नहीं भूला है कोई ...
      नहीं जाता है कहीं
      दूर या पास ; तेरा एहसास !!

      - " तन्हा " !!
      20-02-2016


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