दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे,
नज़रों में बसे जंगल,
अब कंक्रीट में बदल रहे.
दूर तक जातीं ये,
चौड़ी-लंबी सड़कें,
सफर को ख़ूब हैं,
मंज़िल को पहुँचाना छोड़ रहे.
दोस्तों के हो-हल्ले,
नातेदारों के मोहल्ले,
साथ आने को तरस रहे,
इक-दूजे को हाल पर छोड़ रहे.
दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे...
very near to a poet heart... keep it up
ReplyDeletethanks urmila g.
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