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06 July 2017

~~रह जाना~~

आसान नहीं;
अबोल, निशब्द, अनजान रह जाना,
जैसे आसान नहीं, होता, रह जाना,
अस्तित्व का, शब्द का बच जाना,
होता है बहुत कुछ कहन को,
पर, सुनन को भला माना जाना.

आसान नहीं;
अबोल, निशब्द, अनजान रह जाना,
जैसे आना जगत में, रह जाना,
बिन बताए, जीवन बुहार जाना,
होता है बहुत मनमाना करन को,
पर, कहा और का माना जाना.

आसान नहीं;
अबोल, निशब्द, अनजान रह जाना,
जैसे रेत का जल को लील जाना,
बादल से गिर बूंद का जलन न मिटा पाना,
आसान नहीं, शब्द का,
कोलाहल से, बच जाना.

आसान नहीं;
अबोल, निशब्द, अनजान रह जाना,
निज को तज, दूजे को सराहना,
अहं को सहेजना, छोड़, जगत को संवारना.

आसान नहीं; आसान नहीं!

08 May 2013

वो भी एक मई थी, ये भी एक मई है...


7 मई 2013, सुबह 1.55

कभी आना देखा था अपना, अब तो जाना देखिये,
इस फ़ानी दुनिया में यूं, मिट्टी का मट्टी होना देखिये.

काठपुतलियों की यह दुनिया, जाने डोर किसके हाथ है,
कभी इधर उलझाता देखिये, कभी उधर घुमाता देखिये.

काठ से बदन बना, इस काठपुतले का है,
कहीं यूं न हो जाए कभी, पुतले में दिल धड़कता देखिये.

गर गलती हो गई कहीं, मान भी तो लीजिए,
ऐब न ढूंढते रहिए, माफ़ भी तो कीजिये.

कहीं डोर सारी उलझ गई, गर गुत्थियां भी पड़ गईं,
लेकिन किसी पुल्ली में, थोड़ा सूत सुलझा देखिये.

अब कोई आंगन नया, एक नया सवेरा देखिये,
पुतले में है जान बाकी, अब उसका थिरकना देखिये.

31 October 2012

खाक...

खाक ही खाक उड़ रही थी जहां,
मेरा आशियाना था कभी वहां...

अब तो गुज़रे वक्त के कुछ निशां ही,
कभी-कभार नज़र आ जाते हैं यहां!

सोचा नहीं वो मंज़र सामने नज़र आया,
समझा नहीं क्यों, क्या मैं खो आया...

खाक से उठे, खाक में मिल गए,
खाक हुए औ खाक में दफ्न!

'जिंदगी' का बस यही हाल हुआ,
गुबार के नज़र जैसे...
किसी का 'पयाम' हुआ!

18 August 2012

कसक

दोस्त!

आज लगा कि तुम से बात करूं!
लेकिन कहाँ से और कौन सी करूं शुरू?
बहुत दिनों से बात-बात पर याद आते रहे...
आज सोचा कि तुमसे बात कर ही डालूं!

ये तो पता नहीं कि तुम कहाँ हो, क्या कर रहे,
पर यकीन कि बात तुम तक मेरी जा पहुंचेगी!!

दोस्त!

क्या अब भी तुम झूलों पे पेंग देते हो?
बारिश में साथ भीगने का मज़ा लेते हो?
एक से रूठे तो दूसरे दोस्त के कंधे से टिके,
रुआंसे होते हो, तो कभी ज़ार-ज़ार रोते हो?

मीठी  इमली को चूसते हो, या अम्बिया की फांक चबाते हो?

ऐ दोस्त!

क्या अब भी अँधेरे से डर जाते हो,
बिजली कड़के तो हिल ही जाते हो?
मैं क्या आऊं तुम्हारा साथ देने को,
संग तेरे कोई गीत गुनगुनाने को?

क्या मेरा नाम याद है अब भी,
क्या कोई बात याद है अब भी?
दोस्त!! ऐ दोस्त!!


24 February 2012

जब आह भरी तो पता चला, दर्द कहाँ लहराता है!

जब सांस भरी तो पता चला, चैन कहाँ से आता है,

जब पंख खोला तो पता चला, परवाज़ कहाँ से भरता है,

जब जान बची तो पता चला, अर्थ कहाँ से पाता है...

15 November 2011

दिल्ली के दिल

दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे,
नज़रों में बसे जंगल,
अब कंक्रीट में बदल रहे.

दूर तक जातीं ये,
चौड़ी-लंबी सड़कें,
सफर को ख़ूब हैं,
मंज़िल को पहुँचाना छोड़ रहे.

दोस्तों के हो-हल्ले,
नातेदारों के मोहल्ले,
साथ आने को तरस रहे,
इक-दूजे को हाल पर छोड़ रहे.

दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे...

आ मेरी जां!!

वहां नज़रों से बात निकली थी,
यहां धड़कनों ने कान खोल लिए,
बात अपनी तो बन ही जानी थी,
गुलों ने महक के राज़ खोल दिए!

वहां इकरारे-मोहब्बत हो ही जानी थी,
यहां वादा-ए-निबाही भी हमकदम हो लिए,
साज़े-ए-वफ़ा को बज ही जाना था,
सुरों ने छिड़ के राग बोल दिए!

वहां नज़रों से बात निकल गई,
यहां वो धड़कनों में जज़्ब हुई,
अब इस साथ से चमन गुलज़ार करें,
आ मेरी जां,
चश्मे-निगाही से तसव्वुरे-जानां करें!

आ मेरी जां!!

08 August 2011

बिछुड़े दोस्तों के नाम!!

जो बिछुड़ गए वो दोस्त पुराने,
गुज़रे वक्त के वो याराने याद आते हैं,
बेतकल्लुफ़ी वो चुहलबाज़ी,
फिर इसरार कर मनाने याद आते हैं.

पलों में गुज़र गए वो ज़माने,
एहसासों में जज़्ब वो अपनापे,
अब ना वो दोस्त रहे ना वो याराने,
बस यादों में बसे वो मंज़र याद आते हैं.

काश! कोई राह उस ओर को खुल जाती,
तो दौड़ जाते उसी सरमाए की ओर,
जहाँ बीता था बचपन का कुछ वक्त,
जिससे जुड़े हर वाकये याद आते हैं.

साथ मिल-बैठ वो गप्प लगाना, हंसना-हंसाना औ रूठ जाना,
सवालों के छोर पकड़ते-पकड़ते,
एक-दूजे का हमसाया हो जाना,
बिछुड़ गए वो दोस्त अब भी याद आते हैं.

गुज़र गया वक्त पर,
वो यार पुराने अब भी याद आते हैं.

गुज़रा वक्त लौट नहीं आता,
बिछुड़ा कोई मिल नहीं पाता,
फिर भी यादों के इन मनकों से,
ज़िन्दगी की माला पिरोते हैं.

बिछुड़ गए वो दोस्त अब भी याद आते हैं...

28 April 2011

कोई कुछ कहता नहीं फिर भी एक आवाज़ आती है,
चल फिर कोई ठौर ढूँढ तेरा अब यहाँ आबो-दाना नहीं...

27 February 2011

...ऐ दर्द...

हर दर्द में तेरा एहसास रहता था,
तू होगा कोई ख्वाब ये खयाल रहता था,
आज जब साँस लेने पर भी दर्द उठा,
तू सच मेरे पास है, इससे इतेफाक हुआ.
...ऐ दर्द...

21 February 2011

कुछ भी नहीं...

बात कुछ थी और, बात फकत कुछ भी नहीं,
मेरी औकात कुछ नहीं, और मेरी पहचान...
कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...

तुम थे तो बात कुछ हो जाती,
अब सन्नाटे में आवाज...
कुछ भी नहीं.. कुछ भी नहीं...

साथ कोई होता तो हमकदम हो जाता,
इस भीड़ में जज्बातों का मोल,
कुछ नहीं... कुछ भी तो नहीं...

भीड़ के बीच इक शक्ल कभी उभर आती है,
लोग पहचान लें तो हंसी बड़ी आती है,
गर्दो-गुबार के हांथ भी कुछ लग जाता है जहाँ,
मेरे हांथों में वहीँ कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...