जो बिछुड़ गए वो दोस्त पुराने,
गुज़रे वक्त के वो याराने याद आते हैं,
बेतकल्लुफ़ी वो चुहलबाज़ी,
फिर इसरार कर मनाने याद आते हैं.
पलों में गुज़र गए वो ज़माने,
एहसासों में जज़्ब वो अपनापे,
अब ना वो दोस्त रहे ना वो याराने,
बस यादों में बसे वो मंज़र याद आते हैं.
काश! कोई राह उस ओर को खुल जाती,
तो दौड़ जाते उसी सरमाए की ओर,
जहाँ बीता था बचपन का कुछ वक्त,
जिससे जुड़े हर वाकये याद आते हैं.
साथ मिल-बैठ वो गप्प लगाना, हंसना-हंसाना औ रूठ जाना,
सवालों के छोर पकड़ते-पकड़ते,
एक-दूजे का हमसाया हो जाना,
बिछुड़ गए वो दोस्त अब भी याद आते हैं.
गुज़र गया वक्त पर,
वो यार पुराने अब भी याद आते हैं.
गुज़रा वक्त लौट नहीं आता,
बिछुड़ा कोई मिल नहीं पाता,
फिर भी यादों के इन मनकों से,
ज़िन्दगी की माला पिरोते हैं.
बिछुड़ गए वो दोस्त अब भी याद आते हैं...
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