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08 May 2013

वो भी एक मई थी, ये भी एक मई है...


7 मई 2013, सुबह 1.55

कभी आना देखा था अपना, अब तो जाना देखिये,
इस फ़ानी दुनिया में यूं, मिट्टी का मट्टी होना देखिये.

काठपुतलियों की यह दुनिया, जाने डोर किसके हाथ है,
कभी इधर उलझाता देखिये, कभी उधर घुमाता देखिये.

काठ से बदन बना, इस काठपुतले का है,
कहीं यूं न हो जाए कभी, पुतले में दिल धड़कता देखिये.

गर गलती हो गई कहीं, मान भी तो लीजिए,
ऐब न ढूंढते रहिए, माफ़ भी तो कीजिये.

कहीं डोर सारी उलझ गई, गर गुत्थियां भी पड़ गईं,
लेकिन किसी पुल्ली में, थोड़ा सूत सुलझा देखिये.

अब कोई आंगन नया, एक नया सवेरा देखिये,
पुतले में है जान बाकी, अब उसका थिरकना देखिये.

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