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08 May 2013

वो भी एक मई थी, ये भी एक मई है...


7 मई 2013, सुबह 1.55

कभी आना देखा था अपना, अब तो जाना देखिये,
इस फ़ानी दुनिया में यूं, मिट्टी का मट्टी होना देखिये.

काठपुतलियों की यह दुनिया, जाने डोर किसके हाथ है,
कभी इधर उलझाता देखिये, कभी उधर घुमाता देखिये.

काठ से बदन बना, इस काठपुतले का है,
कहीं यूं न हो जाए कभी, पुतले में दिल धड़कता देखिये.

गर गलती हो गई कहीं, मान भी तो लीजिए,
ऐब न ढूंढते रहिए, माफ़ भी तो कीजिये.

कहीं डोर सारी उलझ गई, गर गुत्थियां भी पड़ गईं,
लेकिन किसी पुल्ली में, थोड़ा सूत सुलझा देखिये.

अब कोई आंगन नया, एक नया सवेरा देखिये,
पुतले में है जान बाकी, अब उसका थिरकना देखिये.

31 December 2012

३१.१२.१२ - सुबह - ३.४५/दस्तक दे आते इस साल में

हे ईश्वर!
कभी पीडितों को भी राहत मिले औ
दोषियों को सलीब मिल जाए,
हमारे अंदर की दरिंदगी कुछ घटे
थोड़ी मानवता भी उमड़ आए.
हे ईश्वर!
भ्रष्टाचार के इस नंग-नाच से
इस बरस कुछ तो निजात मिल जाए,
महंगाई की मूसलाधार से हम कुचलों को
किसी कृष्ण की उंगली का तनिक संबल ही मिल जाए.
हे ईश्वर!
परिवारों में परिजनों का प्रेम मिले
पत्नी को बराबरी, मां को थोड़ा आदर औ बहन को सुरक्षा मिल जाए,
वहां बेटी सकुचाए कम, खुल के हंसे-खिलखिलाए.
हे ईश्वर!
इस कलयुगी दुनिया में कुछ
खुदाई भी झलक जाए...
हे ईश्वर, यदि सृष्टि का अंत सन्निकट नहीं तो
जीवन कुछ तो सहज बन जाए...
हे ईश्वर!

31 October 2012

खाक...

खाक ही खाक उड़ रही थी जहां,
मेरा आशियाना था कभी वहां...

अब तो गुज़रे वक्त के कुछ निशां ही,
कभी-कभार नज़र आ जाते हैं यहां!

सोचा नहीं वो मंज़र सामने नज़र आया,
समझा नहीं क्यों, क्या मैं खो आया...

खाक से उठे, खाक में मिल गए,
खाक हुए औ खाक में दफ्न!

'जिंदगी' का बस यही हाल हुआ,
गुबार के नज़र जैसे...
किसी का 'पयाम' हुआ!

18 August 2012

कसक

दोस्त!

आज लगा कि तुम से बात करूं!
लेकिन कहाँ से और कौन सी करूं शुरू?
बहुत दिनों से बात-बात पर याद आते रहे...
आज सोचा कि तुमसे बात कर ही डालूं!

ये तो पता नहीं कि तुम कहाँ हो, क्या कर रहे,
पर यकीन कि बात तुम तक मेरी जा पहुंचेगी!!

दोस्त!

क्या अब भी तुम झूलों पे पेंग देते हो?
बारिश में साथ भीगने का मज़ा लेते हो?
एक से रूठे तो दूसरे दोस्त के कंधे से टिके,
रुआंसे होते हो, तो कभी ज़ार-ज़ार रोते हो?

मीठी  इमली को चूसते हो, या अम्बिया की फांक चबाते हो?

ऐ दोस्त!

क्या अब भी अँधेरे से डर जाते हो,
बिजली कड़के तो हिल ही जाते हो?
मैं क्या आऊं तुम्हारा साथ देने को,
संग तेरे कोई गीत गुनगुनाने को?

क्या मेरा नाम याद है अब भी,
क्या कोई बात याद है अब भी?
दोस्त!! ऐ दोस्त!!


24 February 2012

जब आह भरी तो पता चला, दर्द कहाँ लहराता है!

जब सांस भरी तो पता चला, चैन कहाँ से आता है,

जब पंख खोला तो पता चला, परवाज़ कहाँ से भरता है,

जब जान बची तो पता चला, अर्थ कहाँ से पाता है...

15 November 2011

दिल्ली के दिल

दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे,
नज़रों में बसे जंगल,
अब कंक्रीट में बदल रहे.

दूर तक जातीं ये,
चौड़ी-लंबी सड़कें,
सफर को ख़ूब हैं,
मंज़िल को पहुँचाना छोड़ रहे.

दोस्तों के हो-हल्ले,
नातेदारों के मोहल्ले,
साथ आने को तरस रहे,
इक-दूजे को हाल पर छोड़ रहे.

दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे...

आ मेरी जां!!

वहां नज़रों से बात निकली थी,
यहां धड़कनों ने कान खोल लिए,
बात अपनी तो बन ही जानी थी,
गुलों ने महक के राज़ खोल दिए!

वहां इकरारे-मोहब्बत हो ही जानी थी,
यहां वादा-ए-निबाही भी हमकदम हो लिए,
साज़े-ए-वफ़ा को बज ही जाना था,
सुरों ने छिड़ के राग बोल दिए!

वहां नज़रों से बात निकल गई,
यहां वो धड़कनों में जज़्ब हुई,
अब इस साथ से चमन गुलज़ार करें,
आ मेरी जां,
चश्मे-निगाही से तसव्वुरे-जानां करें!

आ मेरी जां!!