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30 December 2010

नया बरस

जाते बरस का जाना देख, आते बरस का आना देख,
कुछ किस्सा कुछ अफसाना देख...
... देख दिनन के फेर!!!
यही है आशा कि, लोक: समस्त: सुखिनः भवन्तु!!

13 November 2010

क्या होता है?

क्या होता है जब,
मिटटी की देह का साथ छूट जाता है,
पल पल कि सांसों का हिसाब चूक जाता है,
तन की तपिश का बुखार उतर जाता है,
जीवन के बोध का तार कहीं उलझ जाता है,
इहलोक से जुड़े नाते पीछे छूट जाते हैं,
आत्मा का गमन परलोक को हो जाता है,
क्या होता है जब मुक्ति की राह दिख जाती है,
और
कोई बंधन बाँध नहीं पाता है,
तब क्या होता है, कोई तो बताये तब क्या होता है...

01 November 2010

दोस्तों की दुआ के नाम

दोस्तों की दुआएं बताती हैं हमें, साथ चलने को अभी हमराह हैं बहुत,
शुक्र है खुदा कि अभी होश में हूँ, गर लड़खड़ाए तो सहारे को हाथ हैं बहुत...

अपने हुए बेगाने तो क्या, बेगानों में भी अपने हैं बहुत,
तनहा चले थे राह पर मगर, साथ में जुड़ते चले हमराह बहुत...

मंजिल दिखे, दिखे, ना दिखे, सफर में निभाने को हमसफ़र हैं बहुत,
गर ना पहुंचे कहीं, तो कोई गम नहीं, तजुर्बे दामन में समाने को हैं बहुत...

21 October 2010

आशंका की ओट से आशा के किरण की एक झलक

जिंदगी मानो कोई ऐसी दौड़ बनती जा रही है जिसमें पीछे छूट जाने का डर हावी होता जाता है... और इस दौड़ की भी एक खूबी है, पीछे वाला कदम बस आगे ही तो बढाना होता है...
बचपन से सुनते आए हैं कि वीर तुम डरो नहीं, वीर तुम डरो नहीं, सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो, वीर तुम रुको नहीं, वीर तुम झुको नहीं...
लेकिन कभी-कभी हौसले पस्त होने लगते हैं, अपनी हिम्मत जवाब देती सी लगती है... तब लगता है कि आशा की एक किरण कहीं से नज़र तो आए, कोई जोश तो दिलाए...
कोई हो न हो, क्या सोचना, अपनी ताकत तो आप बनना, अपनी राह आप आसान करना, अब तो यही जीवन सन्देश माना जाता है और यही सही भी है...
अब कारवां बनने की राह नहीं ताकी जा सकती, क्योंकि अवसर के पास समय जो नहीं होता...

13 October 2010

एक नई कोंपल

जैसे किसी पेड़ पर जब कोई कोंपल दिखती है तो वो बहुत कोमल और पवित्र लगती है, वैसे ही अभी पड़ोस में दो दिन की बच्ची ने अपने घर में प्रवेश किया... एकाएक मेरे मन में कोंपल का विचार कौंधा.
आखिर इंसान और पेड़ दोनों ही जब तक अस्तित्व में रहते हैं, तब तक कुछ न कुछ सृजन करते जाते हैं...

कुछ नया

इस नई दुनिया में अब कुछ यूं नया किया जाए,
रिश्तों की उधडी डोर छोड़, कुछ नए नाते जोड़े जाएँ.
रिश्तों से तो पटी ये दुनिया, फिर भी दामन ख़ाली क्यों,
अजाने, अदेखे दोस्तों के नाम अब कुछ नया लिखा जाए.

10 October 2010

दैनिक हिंदुस्तान में आज कपूरनामा की समीक्षा छपी.

किसी शब्द के साथ कई बार दूसरा शब्द भी आप ही आप हो लेता है, जैसे दो दोस्त... अब किसको किस शब्द के साथ कौन सा शब्द सूझता है ये तो अपने-अपने अनुभव की बात है!!

06 October 2010

माँ

माँ वो होती है जो आप की शक्ल बनने से पहले और उसे देखने से भी पहले से आप को प्यार करने लगती है! उसको नहीं देखा हमने कभी पर उसकी ज़रूरत क्या होगी, ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी!!

02 September 2010

आज

उम्मीदों को तान कर हौसलों की परवान पर, कल का न करें भरोसा आज के आगाज़ पर. आज को संवार लिया तो कल सज ही जायेगा, कोई नया सपना न देख अब जो देखा उसे सच कर!

11 August 2010

मौन! २५.०८.१९९४ को लिखी कुछ पंक्तियाँ

मौन मौन मौन! क्रिया या अनुभूति, या है एक संवेदना या है सिर्फ मौन! जीवन रुपी बाज़ार की हलचल में, खोता अपना अस्तित्व वो तब है मौन! इस संघर्ष इस यथार्थ से जूझता, अटूट, अपार कष्टों का अनुभव करता वो मौन! कदम पर कदम बढाता ठहरता, विचारता, अपने में ही मग्न चलता जाता वो फिर भी है मौन!!!

22 July 2010

05.10.1992 को लिखी एक कविता

माना कि हमने खाई हैं अभी कम ही ठोकरें, लेकिन हर एक ठोकर कोई राज़ जता गई, जितना ही चाहा हर बात हवा में उड़ा देना, उतना हर बात हमें जिंदगी का अंदाज़ बता गई.
क्या अनुवाद और संपादन को साथ साधने में चूक की गुंजाइश बन रही है... लेकिन किसी एक से नैया पार भी तो नहीं लगने वाली... कोई उपाय नहीं नज़र आता है.

13 July 2010

Naya Gyanodaya

naya gyanoday ke july ank main Mamta Kalia ke hantho likhi Kapoornama ki samikha chapi.

28 June 2010

माटी

क्या कभी कण स्वरुप फैली माटी को गढ़ने पर दर्द हुआ है? क्या उसे किसी आकार में ढाले जाने पर दुख हुआ है? क्या उसे अपने रूप पर मान हुआ है?
नहीं!
क्योंकि उसे पता होता है कि माटी को फिर माटी में मिल जाना होता है. जहाँ से जन्मी, जहाँ से उभरी उसी में समा जाना होता है. फिर इस क्षणिक उपलब्धि पर कैसा इतराना... कैसा मदमाना...
लेकिन माटी फिर भी गूंधी जाती है, फिर फिर नए आकार में ढाली जाती है और सृजन की पीर को महसूसती जाती है... सृजन-मनन का प्रवाह कभी थमता नहीं... कभी किसी राह रुकता नहीं...

घर और अदालत, पुस्तक समीक्षा

17 June 2010

आज और कल के बीच बस कुछ पलों का फासला ही तो होता है... ये चंद मिनटों, घंटों या कभी-कभी अरसों लंबा हो जाता है.

एक पह्चान बनती हुई ...

१६ जून को दैनिक हिंदुस्तान में नई दिशाएं परिशिष्ट में मेरा साक्षात्कार प्रकाशित हुआ.