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28 June 2010

माटी

क्या कभी कण स्वरुप फैली माटी को गढ़ने पर दर्द हुआ है? क्या उसे किसी आकार में ढाले जाने पर दुख हुआ है? क्या उसे अपने रूप पर मान हुआ है?
नहीं!
क्योंकि उसे पता होता है कि माटी को फिर माटी में मिल जाना होता है. जहाँ से जन्मी, जहाँ से उभरी उसी में समा जाना होता है. फिर इस क्षणिक उपलब्धि पर कैसा इतराना... कैसा मदमाना...
लेकिन माटी फिर भी गूंधी जाती है, फिर फिर नए आकार में ढाली जाती है और सृजन की पीर को महसूसती जाती है... सृजन-मनन का प्रवाह कभी थमता नहीं... कभी किसी राह रुकता नहीं...

3 comments:

  1. सृजन की धारा तो युगों युगों से बहती आ रही है...

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  2. yeh to prakarti ka niyam hai, jise jante hue bhi hum kahin na kahin andekha karte hai.

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