दूर आसमां तले कोई, तिनका-तिनका शाम छिटकाटा रहा,
जो रात गहरा गई, उठ तारों में लुका-छिपी खेलता रहा...
अलस्सुबह दौड़ सूरज को थाम लाया वोही, दिन चढे फिर फूँक मान-मार दुपहर बुझाई,
लो सूप लिए फिर वोही शाम छिटकाटा रहा, तपिश के बाद ठंडी हवा की तहान खोलता रहा...
23 June 2011
21 June 2011
18 May 2011
कल तक ख़बरों में पढ़ा करते थे आज अपने घर पर भी बीत गई.
इतवार की रात एक कैब में लिफ्ट लेने के बाद भाई पर घेर कर हमला किया गया और सबकुछ लूट लिया. पी सी आर वेन के सामने से गुजरने और मदद के लिये आवाज़ देने पर भी कोई मदद नहीं मिली. अपनी ही सोसाइटी के सामने की सड़क से ले जाकर कोई २० किलोमीटर दूर फेंक कर गाड़ी पीछे कर उनके पैर पर चढाने की कोशिश भी की गई. भाई तो अँधेरे में भी किसी तरह फुटपाथ पर कूद कर बच गए और चोटिल हालत में बिना मदद मिले आधी रात में पैदल घर पहुंचे. घर में सभी ने शुक्र मनाया कि उन गुंडों ने जान बख्श दी.
एन सी आर में रहने वालों के साथ जब पुलिस ऐसा बर्ताव करती है तो बाकी जगहों का क्या हाल होगा, सोच कर रूह कांपी जा रही है.
दोस्तो, बहुत संभल कर रहिये!! कोई पुलिस-वुलिस नहीं है यहाँ. सब 'राम भरोसे हिन्दू होटल' वाला आलम है!!
एन सी आर में रहने वालों के साथ जब पुलिस ऐसा बर्ताव करती है तो बाकी जगहों का क्या हाल होगा, सोच कर रूह कांपी जा रही है.
दोस्तो, बहुत संभल कर रहिये!! कोई पुलिस-वुलिस नहीं है यहाँ. सब 'राम भरोसे हिन्दू होटल' वाला आलम है!!
28 April 2011
26 March 2011
27 February 2011
...ऐ दर्द...
हर दर्द में तेरा एहसास रहता था,
तू होगा कोई ख्वाब ये खयाल रहता था,
आज जब साँस लेने पर भी दर्द उठा,
तू सच मेरे पास है, इससे इतेफाक हुआ.
...ऐ दर्द...
तू होगा कोई ख्वाब ये खयाल रहता था,
आज जब साँस लेने पर भी दर्द उठा,
तू सच मेरे पास है, इससे इतेफाक हुआ.
...ऐ दर्द...
21 February 2011
कुछ भी नहीं...
बात कुछ थी और, बात फकत कुछ भी नहीं,
मेरी औकात कुछ नहीं, और मेरी पहचान...
कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...
तुम थे तो बात कुछ हो जाती,
अब सन्नाटे में आवाज...
कुछ भी नहीं.. कुछ भी नहीं...
साथ कोई होता तो हमकदम हो जाता,
इस भीड़ में जज्बातों का मोल,
कुछ नहीं... कुछ भी तो नहीं...
भीड़ के बीच इक शक्ल कभी उभर आती है,
लोग पहचान लें तो हंसी बड़ी आती है,
गर्दो-गुबार के हांथ भी कुछ लग जाता है जहाँ,
मेरे हांथों में वहीँ कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...
मेरी औकात कुछ नहीं, और मेरी पहचान...
कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...
तुम थे तो बात कुछ हो जाती,
अब सन्नाटे में आवाज...
कुछ भी नहीं.. कुछ भी नहीं...
साथ कोई होता तो हमकदम हो जाता,
इस भीड़ में जज्बातों का मोल,
कुछ नहीं... कुछ भी तो नहीं...
भीड़ के बीच इक शक्ल कभी उभर आती है,
लोग पहचान लें तो हंसी बड़ी आती है,
गर्दो-गुबार के हांथ भी कुछ लग जाता है जहाँ,
मेरे हांथों में वहीँ कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...
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