दोस्तों की दुआएं बताती हैं हमें, साथ चलने को अभी हमराह हैं बहुत,
शुक्र है खुदा कि अभी होश में हूँ, गर लड़खड़ाए तो सहारे को हाथ हैं बहुत...
अपने हुए बेगाने तो क्या, बेगानों में भी अपने हैं बहुत,
तनहा चले थे राह पर मगर, साथ में जुड़ते चले हमराह बहुत...
मंजिल दिखे, दिखे, ना दिखे, सफर में निभाने को हमसफ़र हैं बहुत,
गर ना पहुंचे कहीं, तो कोई गम नहीं, तजुर्बे दामन में समाने को हैं बहुत...
इक सितारा है फलक में चमकता हुआ, जिसे पाने की उठी है चाह बहुत,
ReplyDeleteगर हाथ आया तो क्या कहिये, नामुराद हसरतें हैं दिल में बहुत...
wah wah shivani,
ReplyDeletekya kehne... khoob likha hai.
शुक्रिया उर्मिला.
ReplyDeleteला-जवाब" जबर्दस्त!!
ReplyDeleteवाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
ReplyDeleteआप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.
बहुत अच्छा लगा भास्कर जी आपकी राय जानकार. शुक्रिया.
ReplyDeleteअति सुंदर ..कम से कम इतना सुकून तो हुआ की ज़िन्दगी के सफ़र में अकेले भी है तो कोई गम नहीं ,कोई साथ दे न दे " तजुर्बे दामन में समाने को हैं बहुत " Very Inspiring!!
ReplyDeleteअंजू जी,
ReplyDeleteशुक्रिया, एहतराम...
मेरा तो हौसला दोबाला हुआ जाता है...