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01 November 2010

दोस्तों की दुआ के नाम

दोस्तों की दुआएं बताती हैं हमें, साथ चलने को अभी हमराह हैं बहुत,
शुक्र है खुदा कि अभी होश में हूँ, गर लड़खड़ाए तो सहारे को हाथ हैं बहुत...

अपने हुए बेगाने तो क्या, बेगानों में भी अपने हैं बहुत,
तनहा चले थे राह पर मगर, साथ में जुड़ते चले हमराह बहुत...

मंजिल दिखे, दिखे, ना दिखे, सफर में निभाने को हमसफ़र हैं बहुत,
गर ना पहुंचे कहीं, तो कोई गम नहीं, तजुर्बे दामन में समाने को हैं बहुत...

8 comments:

  1. इक सितारा है फलक में चमकता हुआ, जिसे पाने की उठी है चाह बहुत,
    गर हाथ आया तो क्या कहिये, नामुराद हसरतें हैं दिल में बहुत...

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  2. wah wah shivani,
    kya kehne... khoob likha hai.

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  3. शुक्रिया उर्मिला.

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  4. वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
    आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
    बधाई.

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  5. बहुत अच्छा लगा भास्कर जी आपकी राय जानकार. शुक्रिया.

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  6. अति सुंदर ..कम से कम इतना सुकून तो हुआ की ज़िन्दगी के सफ़र में अकेले भी है तो कोई गम नहीं ,कोई साथ दे न दे " तजुर्बे दामन में समाने को हैं बहुत " Very Inspiring!!

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  7. अंजू जी,
    शुक्रिया, एहतराम...
    मेरा तो हौसला दोबाला हुआ जाता है...

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