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15 November 2011

दिल्ली के दिल

दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे,
नज़रों में बसे जंगल,
अब कंक्रीट में बदल रहे.

दूर तक जातीं ये,
चौड़ी-लंबी सड़कें,
सफर को ख़ूब हैं,
मंज़िल को पहुँचाना छोड़ रहे.

दोस्तों के हो-हल्ले,
नातेदारों के मोहल्ले,
साथ आने को तरस रहे,
इक-दूजे को हाल पर छोड़ रहे.

दिल्ली के दिल सिकुड रहे,
दायरे भी तंग हो रहे...

आ मेरी जां!!

वहां नज़रों से बात निकली थी,
यहां धड़कनों ने कान खोल लिए,
बात अपनी तो बन ही जानी थी,
गुलों ने महक के राज़ खोल दिए!

वहां इकरारे-मोहब्बत हो ही जानी थी,
यहां वादा-ए-निबाही भी हमकदम हो लिए,
साज़े-ए-वफ़ा को बज ही जाना था,
सुरों ने छिड़ के राग बोल दिए!

वहां नज़रों से बात निकल गई,
यहां वो धड़कनों में जज़्ब हुई,
अब इस साथ से चमन गुलज़ार करें,
आ मेरी जां,
चश्मे-निगाही से तसव्वुरे-जानां करें!

आ मेरी जां!!