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21 October 2010

आशंका की ओट से आशा के किरण की एक झलक

जिंदगी मानो कोई ऐसी दौड़ बनती जा रही है जिसमें पीछे छूट जाने का डर हावी होता जाता है... और इस दौड़ की भी एक खूबी है, पीछे वाला कदम बस आगे ही तो बढाना होता है...
बचपन से सुनते आए हैं कि वीर तुम डरो नहीं, वीर तुम डरो नहीं, सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो, वीर तुम रुको नहीं, वीर तुम झुको नहीं...
लेकिन कभी-कभी हौसले पस्त होने लगते हैं, अपनी हिम्मत जवाब देती सी लगती है... तब लगता है कि आशा की एक किरण कहीं से नज़र तो आए, कोई जोश तो दिलाए...
कोई हो न हो, क्या सोचना, अपनी ताकत तो आप बनना, अपनी राह आप आसान करना, अब तो यही जीवन सन्देश माना जाता है और यही सही भी है...
अब कारवां बनने की राह नहीं ताकी जा सकती, क्योंकि अवसर के पास समय जो नहीं होता...

13 October 2010

एक नई कोंपल

जैसे किसी पेड़ पर जब कोई कोंपल दिखती है तो वो बहुत कोमल और पवित्र लगती है, वैसे ही अभी पड़ोस में दो दिन की बच्ची ने अपने घर में प्रवेश किया... एकाएक मेरे मन में कोंपल का विचार कौंधा.
आखिर इंसान और पेड़ दोनों ही जब तक अस्तित्व में रहते हैं, तब तक कुछ न कुछ सृजन करते जाते हैं...

कुछ नया

इस नई दुनिया में अब कुछ यूं नया किया जाए,
रिश्तों की उधडी डोर छोड़, कुछ नए नाते जोड़े जाएँ.
रिश्तों से तो पटी ये दुनिया, फिर भी दामन ख़ाली क्यों,
अजाने, अदेखे दोस्तों के नाम अब कुछ नया लिखा जाए.

10 October 2010

दैनिक हिंदुस्तान में आज कपूरनामा की समीक्षा छपी.

किसी शब्द के साथ कई बार दूसरा शब्द भी आप ही आप हो लेता है, जैसे दो दोस्त... अब किसको किस शब्द के साथ कौन सा शब्द सूझता है ये तो अपने-अपने अनुभव की बात है!!

06 October 2010

माँ

माँ वो होती है जो आप की शक्ल बनने से पहले और उसे देखने से भी पहले से आप को प्यार करने लगती है! उसको नहीं देखा हमने कभी पर उसकी ज़रूरत क्या होगी, ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी!!