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31 October 2012

खाक...

खाक ही खाक उड़ रही थी जहां,
मेरा आशियाना था कभी वहां...

अब तो गुज़रे वक्त के कुछ निशां ही,
कभी-कभार नज़र आ जाते हैं यहां!

सोचा नहीं वो मंज़र सामने नज़र आया,
समझा नहीं क्यों, क्या मैं खो आया...

खाक से उठे, खाक में मिल गए,
खाक हुए औ खाक में दफ्न!

'जिंदगी' का बस यही हाल हुआ,
गुबार के नज़र जैसे...
किसी का 'पयाम' हुआ!