खाक ही खाक उड़ रही थी जहां,
मेरा आशियाना था कभी वहां...
अब तो गुज़रे वक्त के कुछ निशां ही,
कभी-कभार नज़र आ जाते हैं यहां!
सोचा नहीं वो मंज़र सामने नज़र आया,
समझा नहीं क्यों, क्या मैं खो आया...
खाक से उठे, खाक में मिल गए,
खाक हुए औ खाक में दफ्न!
'जिंदगी' का बस यही हाल हुआ,
गुबार के नज़र जैसे...
किसी का 'पयाम' हुआ!
सोचा नहीं वो मंज़र सामने नज़र आया,
समझा नहीं क्यों, क्या मैं खो आया...
खाक से उठे, खाक में मिल गए,
खाक हुए औ खाक में दफ्न!
'जिंदगी' का बस यही हाल हुआ,
गुबार के नज़र जैसे...
किसी का 'पयाम' हुआ!