क्या होता है जब,
मिटटी की देह का साथ छूट जाता है,
पल पल कि सांसों का हिसाब चूक जाता है,
तन की तपिश का बुखार उतर जाता है,
जीवन के बोध का तार कहीं उलझ जाता है,
इहलोक से जुड़े नाते पीछे छूट जाते हैं,
आत्मा का गमन परलोक को हो जाता है,
क्या होता है जब मुक्ति की राह दिख जाती है,
और
कोई बंधन बाँध नहीं पाता है,
तब क्या होता है, कोई तो बताये तब क्या होता है...
13 November 2010
01 November 2010
दोस्तों की दुआ के नाम
दोस्तों की दुआएं बताती हैं हमें, साथ चलने को अभी हमराह हैं बहुत,
शुक्र है खुदा कि अभी होश में हूँ, गर लड़खड़ाए तो सहारे को हाथ हैं बहुत...
अपने हुए बेगाने तो क्या, बेगानों में भी अपने हैं बहुत,
तनहा चले थे राह पर मगर, साथ में जुड़ते चले हमराह बहुत...
मंजिल दिखे, दिखे, ना दिखे, सफर में निभाने को हमसफ़र हैं बहुत,
गर ना पहुंचे कहीं, तो कोई गम नहीं, तजुर्बे दामन में समाने को हैं बहुत...
शुक्र है खुदा कि अभी होश में हूँ, गर लड़खड़ाए तो सहारे को हाथ हैं बहुत...
अपने हुए बेगाने तो क्या, बेगानों में भी अपने हैं बहुत,
तनहा चले थे राह पर मगर, साथ में जुड़ते चले हमराह बहुत...
मंजिल दिखे, दिखे, ना दिखे, सफर में निभाने को हमसफ़र हैं बहुत,
गर ना पहुंचे कहीं, तो कोई गम नहीं, तजुर्बे दामन में समाने को हैं बहुत...
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