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22 July 2010

05.10.1992 को लिखी एक कविता

माना कि हमने खाई हैं अभी कम ही ठोकरें, लेकिन हर एक ठोकर कोई राज़ जता गई, जितना ही चाहा हर बात हवा में उड़ा देना, उतना हर बात हमें जिंदगी का अंदाज़ बता गई.

1 comment:

  1. आज भी इन पंक्तिओं में वही भाव झलक रहा है. वक्त बीत जाता है मगर अनुभव नहीं बीतता...

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