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14 January 2016

"अब आगे क्या?"

"होरहाहै एक प्रतिभाका अंत सारी विधायें हाथसे धीरे2छूट रहीहैं शिवा अंदर2टूट रहीहै बिखर रहीहै चारो तरफ अंधकारहै मैं असहाय मूक देखरहीहूँ ।पर उमीदकी एककिरणहै फिरसे शमा जलेगी रोशनी फैलायेगी ।"

जब ११ जनवरी को नौकरी से थक-हार के लौटी मैं घर पर चाय के साथ अपने फ़ोन से दुनिया के हाल जानने के जतन कर रही थी तभी fb पर अपनी माँ के मन की इस बात पर नज़र पड़ी और मेरी आँखें छलछला गईं!!

हाँ, दर्द मेरा था, मेरे जीवन से जुड़ा था लेकिन उसका असर अपनी मम्मी पर कहीं साफ़ दिखा उस पल. मैं दुखी हुई और फिर डर भी गई, इधर कई बार ऐसे अनुभवों से गुज़रना पड़ा है जब यह पता नहीं चल पाता मुझे कि अब आगे क्या करूं या क्या करना ठीक होगा.
मैं अपनेआप को काफ़ी मज़बूत मानती आई हूँ लेकिन वक्त की चोट कहीं लग रही है और महसूस करा रही है... अपनी कमज़ोरी. ना, ना कमज़ोर पड़ना कोई गुनाह भी नहीं, और न ही कोई स्थाई भाव है! यह तो हर पल की तरह ही आता हुआ एक पल है और कुछ देर बाद जा चुका एक पल हो जायेगा!

आज उस दिन से कहीं अलग दिन है और भाव भी, आज मेरे खाते में एक बार फिर कुछ नहीं... न जीवन के खाते में और ना ही बैंक के! एक बार फिर वही 'कुछ नहीं'... लेकिन आज मैं मुक्त हुई हूँ, अपनी कुछ पुरानी, अधूरी रह गई जवाबदेहियों से !!! इसे मैं असफलता इसलिए नहीं मान सकती क्योंकि आज ही मैं अपने सभी उधारों से भी मुक्त हुई हूँ!

बस अब एक ही ज़िम्मेदारी बची है, जो मुझे दिल से दी गई थी और जिसे मैं पूरी ईमानदारी से निभा के रहूंगी, क्योंकि यह भरोसा हर किसी पर नहीं जताया जाता, खुशकिस्मत समझती हूँ कि मेरी सबसे कठिन घड़ी में भी किसी ने इतने भरोसे के लायक मुझे समझा था. आज तो बेशक कहीं बेहतर वक्त है!!

अपनी माँ के अंदर पनपी इस असहायता को मुझे ही दूर करना होगा! आने वाले कल को गुज़रे कल से बेहतर बनाना ही होगा. यही वो अगला लक्ष्य है, जिसे साधने की कोशिश करनी है! मेरे लिए कल भी बड़े दादा और मम्मी मेरी मंज़िल देख सकने वाली दो आँखें थे और आज भी वो हैं.

मम्मी ने मुझे "अब आगे क्या?" सवाल के "जवाब" को ढूँढने का सिरा पकड़ा दिया है, आगे जो मैं कर पाऊँ!
लेकिन हाँ, अपनी असफलताओं के कड़वे घूँट के साथ उपलब्धियों की मिठास तो खोज निकालनी ही होगी न, वो भी मुझको ही!

कुछ अवसर ज़रूर मिले थे जिन्हें संभाल नहीं सकी... तो उनको आगे किसी और के लिए जाने देना ठीक ही तो हुआ. कोई और कहीं बेहतर होगा जो उसे पायेगा और मेरे लिए जो उपयुक्त होगा उस तक मैं भी पहुँच ही जाऊंगी.
वक्त लगता है, अवसर आने में और उसके लायक ख़ुद को साबित करने में! सबको लगता है, थोड़ा कम तो थोड़ा ज्यादा... वक्त कल अच्छा था, तो कल फिर अच्छा होगा! ज़रूर होगा!!