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हमारे देश में लगातार सड़क
दुर्घटनाओं और सड़क पर आक्रामकता में बढ़ोत्तरी होती जा रही है। कई कारण इसके ज़िम्मेदार
हो सकते हैं लेकिन सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि अगर हमारे
हाथ में कोई ताकत आती है तो साथ ज़िम्मेदारी भी आती है। हम जब सड़क पर अपनी कार-बाइक
चलाते-दौड़ाते हैं तो अपने सहसवारों और यात्रियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी खुद-ब-खुद
हमारे हाथ में आ जाती है।
रफ्तार से जुड़ी दुर्घटनाओं
के बारे में हम रोजमर्रा के जीवन में सुनते ही रहते हैं और लगभग रोज़ अखबारों में
उनसे जुड़े समाचार पढ़ते हैं। पढ़ते हैं, सुनते हैं, थोड़ा दुखी होते हैं, फिर और ज़्यादा ध्यान देने
की ज़रूरत समझे बिना अगली किसी बात पर सोचने लग जाते हैं।
लेकिन हम यह नहीं सोचते कि
यही रफ्तार, यही गति क़भी हमारे किसी नज़दीकी,
किसी जान-पहचान वाले को अपना शिकार बनाए तो क्या हो, और देखते-देखते
जीते-जागते इंसान को तस्वीर में तब्दील कर दे तो क्या गुज़रेगी हम पर!! लेकिन ऐसा कुछ
उमंग और कुमार साब के जीवन में घटा जिसमें इस रफ्तार की बड़ी अहम भूमिका रही। जिसने
कल्पना से परे जाकर सबको ज़िंदगी और ज़िंदा होने की अहमियत जता दी।
उमंग और कुमार साब दोनों एकदम
विरोधी खूबियों के मालिक हैं। उनका स्वभाव, सोच और जीवन को लेकर नज़रिया बिलकुल अलहदा हैं। हमारे
पहले नायक चंडीगढ़ में रहने वाले उमंग, अपने नाम के जैसे ही हर काम बड़े जोश और कई बार तो
पलक झपकते ही करने में विश्वास करते हैं। आईटी से इंजीनियरिंग करने वाले 22-23 साल
के उमंग अपने पिता की महत्वाकांक्षी संतान हैं। घर में माँ और छोटा भाई भी हैं
लेकिन उमंग के क्या कहने। रफ्तार और बेफिक्री तो पहचान है उसकी। हर काम को
चुटकियां बजाते ही करना और जल्द से जल्द पूरा करने में उसका कोई सानी नहीं।
कभी माँ टोक भी देतीं,
“बेटा, थोड़ा धीरे!” तो उमंग का झट जवाब आ जाता,
“कुछ नहीं होता, माँ!” वैसे भी उमंग, माने माँ की जान तो पिता की
शान। किसी भी ऐब से दूर पौने छ्ह फीट का नौजवान, थोड़ा तंदुरुस्त और जिम
में वर्क आउट का बेहद शौकीन है उमंग। हफ्ते में पाँच दिन तो जिम के लिए तय ही हैं
फिर चाहे पढ़ाई और लाइब्रेरी के वक्त में फेर-बदल करना पड़ जाए लेकिन जिम भक्ति में
कभी कोई फर्क नहीं पड़ने देता।
वहीं हमारे दूसरे नायक
पचास साल के कुमार साब, दो बच्चों के पिता और अपनी माँ,
बहन और पत्नी के साथ दिल्ली में एक खुशहाल जीवन के प्रयास में तल्लीन शख्स हैं।
स्कूल जाते दो बच्चे। बेटा 14 साल का और बेटी 17 साल की जो अपने पिता को ही अपना
हीरो मानते हैं। उनके हफ्ते के पाँच दिन जहां स्कूल-ऑफिस की भाग-दौड़ के नाम होते
वहीं सप्ताहांत के दो दिन घर का सामान लाने, साथ-साथ खाना खाने, शाम को नेहरू पार्क में
सपरिवार टहलने के। साथ-साथ आने वाले हफ्ते की तैयारी में जुटा रहने वाला छह
सदस्यों का यह परिवार ज़िंदगी को भरपूर जीने और उसमें संतुलन बनाए रखने में विश्वास
करता, जिसकी रीढ़ हैं कुमार साब।
दक्षिणी दिल्ली की एक
सरकारी कॉलोनी में रहने वाले कुमार साब सरकारी अधिकारी हैं जो ज़िंदगी के हर पल को
भरपूर जीने में यकीन करते हैं और खाओ-पियो, ऐश करो का मंत्र जपते हैं। घी और मक्खन के बेहद
शौकीन। जब भी कोई सेहत और भविष्य की चिंता करने को कहता तो जवाब आता,
“कल किसने देखा है, भाई। आज को तो ठीक से जी लें!”
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हमेशा हँसते-मुसकुराते और
सामने वाले के चेहरे पर भी मुस्कान लाने के जतन में ही मशगूल रहने वाले कुमार साब।
कभी-कभी तो किसी अनजान तक को परेशान देख लेते तो बेझिझक समस्या की वजह पूछ लेते और
फिर उसकी परेशानी हल करने की कोशिश भी कर डालते। कोई पूछता कि आप ऐसा क्यों करते
हो तो बड़ी संजीदगी से कह दिया करते, “आई एम दी मैन ऑफ सोल्यूशन्स!” और मुसकुराते हुए
अपनी कोशिश जारी रखते।
इन दोनों किरदारों की इस
कहानी में सब कुछ बिलकुल साधारण सा ही तो है लेकिन नहीं,
इनके अलावा एक तीसरा किरदार भी है और वो है, रफ्तार! अब आप पूछेंगे कि क्या यह रफ्तार भी कोई किरदार
निभा सकता है? तो जवाब है, हाँ! हाँ, रफ्तार भी एक किरदार है और यही रफ्तार इस कहानी को
एक अलग ही मोड़ दे देता है। कैसे, सुनते जाइए ज़रा।
तो उमंग के सेमेस्टर एंड
की परीक्षाएँ बस ख़त्म होने ही वाली थीं। परीक्षाओं के बाद उसे क्या करना है इसकी
योजना उसने पहले से ही बनानी शुरू कर दी थी। आखिरकार पूरे साल की मेहनत का सिला
मिलने वाला था और साथ ही कुछ पलों की फुर्सत भी, दोस्तों-यारों के संग
बेफ़िक्र हो घूमने-फिरने के लिए। घर पर उमंग की माँ भी तैयारी कर रही थीं और एक
सुबह उन्होने पूछ ही लिया, “क्यों उमंग, इस बार क्या सोचा है?
हमलोगों के साथ किसी पहाड़ी स्थली तक चलोगे या दोस्तों के साथ कोई दूसरा ही प्लान
बना रखा है?”
उमंग ने थोड़ा जल्दी-जल्दी
नाश्ते में परोसा गया पोहा चबाते हुए अपना मुंह खाली किया और उत्साह से बोल पड़ा,
“क्या माँ, इतनी देरी से पूछा! मेरा कार्यक्रम तो पिछले हफ्ते
ही पक्का हो गया। पता है, इस बार हमलोग सड़क के रास्ते दिल्ली होते हुए जयपुर
जायेंगे और फिर वहाँ से शिमला या नैनीताल, जैसा मूड किया।” उमंग की बात से तो उसकी माँ चौंक
ही गई थीं जैसे, “क्या, बाइ रोड!”
“हाँ,
माँ,”
उमंग जोश में उमगता हुआ अपनी ही
रौ में था, “देखो, बाइ रोड जाने के अपने कई फायदे हैं। पहले से कहीं
कोई जगह या ट्रेन नहीं रिज़र्व करानी पड़ती। और ऐसे में जहां ज़रूरत लगे वहाँ रुका जा
सकता है और देहाती-स्थानीय माहौल का लुत्फ़ उठाया जा सकता है। है न यह मज़ेदार! पता
है माँ, हमलोग पहले बाइक से जाने वाले थे लेकिन अब दो कारों से जाएंगे।
एक तो वो पापा वाली ले जाऊंगा जिसे मैं चलाऊँगा और दूसरी मेरा सुपरमैन दोस्त अभिनव
चलाएगा, उसके पापा वाली!”
उमंग की माँ ने थोड़ा
सकुचाते हुए फिर पूछा, “पापा से पूछा?” फौरन उमंग ने बताया,
“कब का! वो तो बहुत उत्साहित हैं, मुझसे भी ज़्यादा!”
उमंग की माँ ने संभलते हुए
आगे पूछा, “तो कितने लोगों की टोली है अबकी?”
तपाक से उमंग का जवाब आया, “कोई 8-9 लोग हैं, माँ।”
उमंग की माँ सोच में पड़
गईं। अभी तो उमंग इतना बड़ा नहीं हुआ था कि ऐसी किसी यात्रा पर जाए लेकिन अगर ज़रा
सा भी नानुकुर किया तो उमंग के पापा ही समझाना शुरू कर देंगे। “देखो,
उमंग की माँ, अब हमारा बेटा बड़ा हो रहा है। उसके फैसलों में
भरोसा जताया करो। हम ही भरोसा नहीं जताएँगे तो फिर और लोग कैसे यकीन करेंगे,
हाँ!”
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उमंग की माँ न चाहते हुए
भी उमंग की इस यात्रा के लिए तैयार तो हो गईं थीं। लेकिन उनका दिल ही जानता था कि
वह कैसे-कैसे डरावने खयालातों से घिरीं जा रही थीं। लेकिन नौजवानी के जोश में उमंग
के तो पांव ही ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह तो अपनी मेज़ पर रखे कैलेंडर में हर
बीतते दिन के साथ उस पर एक स्माइली सजाता जा रहा था और एक-एक दिन गिन-गिनकर काट
रहा था।
इधर कुमार साब अपने बच्चों
की परीक्षाओं की तैयारी करवाने और उन्हें ठीक से दिलवाने के लिए कोई महीने भर की
छुट्टियों पर घर पर ही थे। इस समय उनका सारा ध्यान अपने परिवार और बच्चों पर ही
था। जो थोड़ा-बहुत अतिरिक्त समय मिल भी जाता तो उसे घर का भूगोल ठीक करने,
सँवारने में बिता देते।
अभी कुछ ही दिनों पहले,
कई महीनों से सोचते रहने के बाद कुमार साब अपनी बहन के साथ किताबों की एक अलमारी
खरीद के लाये थे। किताबें कुमार साब का पहला प्यार जो थीं। अब तक उनके पास कोई एक
दर्जन गत्ते किताबों से भरे हुए हो गए थे। कई दशकों से जमा की हुई किताबें थीं ये।
एक दिन सुबह से ही सारे काम समय से निपटते जा रहे थे तो कुमार साब के पास उनकी बहन
आई।
“दादा,
चलो न किताबें गत्ते से निकाल के अलमारी में रख दें। कितने सालों से बेचारी बंद
पड़ीं हैं। अब तो अलमारी भी ले आएं हैं और आज समय भी मिल गया है!” कुमार साब की बहन
ने कहा।
“हाँ,
हाँ। चलो, ये काम भी कर लें। फिर पता नहीं कब फुर्सत मिले!” मुसकुराते हुए कुमार साब
ने अपनी बहन की बात का समर्थन किया। फिर दोनों भाई-बहन ने मिलकर सारे गत्ते धूप
में रखे, कमरे की सफाई की और फिर शाम होने तक गत्ते खुलकर उनके अंदर बंद
पड़ी किताबें एक बार फिर ताज़ी हवा और रौशनी का स्वाद चखने लगी थीं।
उस रात कुमार साब बहुत खुश
हुए। सालों के बाद अब सारी किताबें एक ही नज़र में दिख जो रही थीं। चलो,
अब कुछ किताबें भी पढ़ ली जाएँ... वो मन ही मन मुस्कुरा दिये। और फिर बच्चों के साथ
उनकी पढ़ाई पर बातचीत करने और उनकी शंकाओं का समाधान करने में व्यस्त हो गए।
आखिरकार वो दिन आ ही गया
जब उमंग का इंतज़ार ख़त्म हुआ और उसके कैलेंडर के सारे दिनों पर स्माइली खिल उठे थे।
सुबह-सुबह उसके सभी दोस्त बड़े खुशी-खुशी दोनों कारों में सवार हुए और धूल उड़ातीं,
हवा से बातें करतीं एक जोड़ी गाड़ियाँ अपनी यात्रा पर चल पड़ीं। कोई 6-7 घंटे बाद
उनकी टोली दिल्ली में कुतुब मीनार परिसर की सड़कों तक पहुँच गई थी। अब वो सभी अपने
माता-पिता की नज़रों से दूर थे और आज़ादी का भरपूर मज़ा उठाना चाहते थे।
फिर उमंग और उसके दोस्तों
ने सबसे पहले कुछ खाने-पीने का बंदोबस्त देखा और एक रेस्तरां में पड़ाव डाल दिया।
इतनी लंबी यात्रा से सभी थोड़ा थक तो गए थे लेकिन जोश तनिक भी फीका नहीं पड़ा था।
कुछ लंबा समय बीतते-बीतते थोड़े चिढ़े हुए सुर में सुनाई पड़ा,
“ओए, अब क्या इतनी दूर आकर बस खाते-पीते ही रहेंगे। पेट पूजा से आगे
भी कुछ दिखता है तुम लोगों को?” यह अभिनव की आवाज़ थी।
“अब चिल कर यारे! क्या आते
ही मॉम की तरह डांटने लगा!” टोली के एक दूसरे साथी ने चुटकी ली और सभी खिलखिलाकर
हंस दिये। उमंग और उसके दोस्तों ने कुछ बर्गर और पीत्सा मँगवाए और उसके साथ ठंडी
कोल्डड्रिंक गटकने लगे।
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इस ढींगा-मस्ती के बीच दोपहर
ढलने लगी। तपता सूरज सिकते गुलाब जामुनसा सुनहरा गुलाबी होता हुआ कहीं घुलता जा
रहा था जिसके बिखरते शीरे से धीरे-धीरे आसमान का रंग भी सुनहरा होने लगा। शाम की इस
सुनहरी रौशनी में कुतुबमीनार और खूबसूरत हो गया। उसकी इमारत का वास्तु,
पास ही बनी कुव्वत-ए-इस्लाम याने इस्लाम का नूर मस्जिद की सुंदरता भी देखते ही बनती थी। वो सभी इस नज़ारे
में ऐसे खोये कि पता ही नहीं चला कब शाम का अँधियारा घिर आया। उस रोज़ चाँदनी रात
थी और थोड़ी देर में मस्जिद की एक मीनार के पीछे से जब चाँद झाँका तो उमंग के दिल से पहली
बार निकला, ‘काश, आज माँ-पापा साथ होते तो कितना अच्छा लगता!’
तभी अभिनव की आवाज़ से उसका
ध्यान टूटा। वो सभी से कह रहा था, “क्यों यारो, क्या चाँदनी में डूबे कुतुब से ही काम चला लोगे!”
उसके स्वर में उलाहना साफ झलक रही थी, “याद नहीं, कल हमें दिल्ली दर्शन वाली बस में घूमना है। समय
पर सोएँगे नहीं तो क्या ख़ाक सुबह नींद खुलेगी! वरना तुमलोग तो नक्शा पकड़कर बस पूरा
शहर कार से ही घूमने की फ़िराक में...”
उमंग ने उसकी बात काट दी,
“यार अभि, इतनी देर पूरे कुतुब को घूम-घूम के देखने में ही
लगे रह गए। ज़रा रुक, मैं चुटकियों में कुछ तस्वीरें भी तो ले लूँ। आख़िर,
पता कैसे चलेगा कि यह चाँदनी रात में किस कदर सुहाना दिखता है!”
फिर उमंग ने अपने मोबाइल
फोन के कैमरे में फटाफट कई तस्वीरें कैद कर लीं। दोस्त यह देखते ही चौंक गए। उमंग
कभी किसी इमारत की तस्वीर न तो लेता और न ही औरों को लेने देता। बस यही कहता,
“बेजान ईंट-पत्थरों की तस्वीर क्या लेना, लो तो हम जैसों की, यार। देख कर जिन्हें दिल तो
डोले...” यह बदलाव सुखद था! खैर, सभी झट से दोनों कारों में सवार हो एक दोस्त के
बताए ठिकाने की ओर चल पड़े।
इधर वह दिन कुमार साब का भी
बहुत व्यस्त गुज़रा। वो सुबह से भाग-दौड़ में लगे रहे। उन्हें आय कर भरना था जिसमें
अब कुछ ही दिन रह गए थे। सारी कागज़ी कार्यवाई वैसे तो ऑफिस में ही होती लेकिन सभी
ज़रूरी कागज़ इकट्ठे करके देने का काम तो उनका था। वो दोनों बच्चों के स्कूल गए।
उनकी फीस समय से भरकर सालभर की रसीदें तारीख़ के हिसाब से लगाईं। दोपहर होते-होते उन्होने
अस्पतालों के कागज़ भी दुरुस्त कर लिए। इलाज और दवाईयों के पर्चे भी तो लगाने पड़ते
हैं। फिर उन्हें एक बैंक से भी कुछ कागज़ लाना था। ऐसे ही उस दिन की दोपहर बीतने को
हो आई।
फुर्सत पाकर नहाने के बाद
जब कुमार साब खाना खाने बैठे तो अपनी पत्नी से बोले, “मैंने सभी कागज़ ठीक से
लगा दिये। अब बस इस फ़ाइल को ऑफिस ले जाना है। अच्छा, कोई और ज़रूरी काम न हो तो
चलो, नेहरू पार्क चलें।”
कुमार साब की पत्नी ने
जवाब दिया, “भूल गए क्या, बच्चों की परीक्षाएँ होने
वाली हैं। कहीं नहीं जाना और ना उन्हें कहीं घुमाना है।” इस पर कुमार साब हँसते
हुए बोले, “अरे, सब तैयार है मेरे बच्चों का। खूब मेहनत की है
दोनों ने। थोड़ा घूम लेंगे तो दिमाग तरोताज़ा हो जाएगा,
चलो।”
खाना खाने के बाद वो फिर
सपरिवार पहुँच गए अपने पसंदीदा पार्क। वहाँ की ताज़गी,
नए-नए खिले रंग-बिरंगे फूलों, हरियाली की खुशबू उन्हें बहुत भाती थी। वहाँ का एक
चक्कर पूरा करते-करते शाम पूरी तरह ढल गई और उनके घर लौटते-लौटते रात भी घिर आई।
पार्क से अपनी कार मोड़ने से पहले कुमार साब ने हमेशा की तरह एक बार फिर उसकी
सुंदरता को जी भरकर निहारा। और मन ही मन यह सोचकर मुस्कुरा दिये कि ‘यह
प्रकृति भी क्या शय है, हर तरह की रौशनी में कमाल लगती है!’
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घर पहुँच सब लोगों ने साथ
नाश्ता किया और चाय पी, फिर अपने-अपने कामों में जुट गए। अभी कुमार साब
अपनी कमर सीधी करने के बारे में सोच ही रहे थे कि अचानक चुस्ती से उठ खड़े हुए। ‘ओहो!
आज तो मुझे मिलने जाना था।’ उन्होने अपने दोस्त को कुछ ज़रूरी बात करने के लिए आज
की शाम का समय दिया हुआ था और इन सारी मसरूफ़ियत में उनके दिमाग से यह बात निकल गई।
उन्होने तुरत-फुरत अपने
स्कूटर की चाबी उठाई और बाहर के दरवाज़े की ओर बढ़ गए। जब तक उनकी पत्नी कुछ कहतीं
वो जाने की तैयारी कर चुके थे। दरवाज़े पर पहुँचकर वो चौंक गईं,
“अरे, स्कूटर से क्यों जा रहे हैं? कार से जाइए।” इस पर
कुमार साब ने जवाब दिया, “रिंग रोड पर इस समय कार लेकर जाना समय का ख़ून
कराना है। जब से मैट्रो का काम शुरू हुआ है, यही रोना है। अच्छा, थोड़ी देर में आता हूँ।”
और उन्होने हेल्मेट पहनकर उसका बकल बंद करके स्कूटर आगे बढ़ा दिया।
उधर उमंग अपनी कार मज़े से
चला रहा था कि एक दोस्त ने बात छेड़ी, “पता है, दिल्ली में नशा करके गाड़ी चलाना सख़्त मना है!” इस
पर उमंग बोल पड़ा, “वैसे भी, गाड़ी चलाने के लिए नशे की नहीं होश की जरूरत होती
है।” वो दोस्त भी कहाँ पीछे हटने वाला था, “होश, वो तो बिना जोश बेकार है,
समझे कुछ!” उसने जड़ा। “अच्छा!” उमंग चिढ़ गया, “तुझे क्या लगा,
मैं एंवें ही ड्राइव कर रहा हूँ?”
इस पर दोस्त ने ताना मारा,
“फिर दिल्ली की सड़कों पर सही स्पीड में ज़रा चला के तो दिखा!” बात उमंग के दिल पर
जा लगी। उसने आव देखा ना ताव गियर बदलकर एक्सीलेटर पर दबाव बढ़ा दिया। देखते-देखते
उनकी कार हवा से बातें करने लगी। अगल-बगल चल रही गाड़ियाँ तेज़ी से पीछे छूटने लगीं।
उमंग की कार की बढ़ती
रफ्तार देखते ही अभिनव की कार से फोन आ गया। “ओए! क्या कर रहा है ये उमंग?
दिमाग तो सही है! मरवाएगा! अब हैवी ट्रेफिक भी खुल चुका है। उससे कह होश की दवा
करे।”
लेकिन उमंग की कार का
माहौल बदल चुका था। उसे अपने दोस्तों के सामने खुद को साबित जो करना था। इस समय उसकी
कार 100 किलोमीटर प्रति घंटे से भी तेज़ रफ्तार में आगे बढ़ रही थी। और इस रफ्तार के
नशे में बाकी दोस्त भी डूब चुके थे। कुछ किलोमीटर आगे बढ़ने पर उमंग ने दायें हाथ की
सड़क पर अपनी कार मोड़ी। अब वो दक्षिणी दिल्ली के आर के पुरम इलाके में थे। यहाँ
सड़कें चौड़ी-सपाट थीं और उमंग तेज़ रफ्तार के नशे में धुत्त। जिस सड़क पर वो बढ़ रहे
थे वह कुछ घुमावदार थी और आगे बहुत दूर तक नहीं दिख रहा था लेकिन उमंग,
वह तो अपनी बेफ़िक्री में चूर था। उसे इसकी परवाह ही कहाँ थी!
कुछ पलों के बीतते-बीतते
उसके बाजू में बैठे दोस्त का ध्यान जलती-बुझती लाईट पर गया,
“अर्रे, सामने तो कट है! ए उमंग, गाड़ी धीमी कर!”
तभी उमंग को नज़र आया कि उस
कट पर कोई दायें ओर से पहले ही सड़क पार कर बाएँ ओर को जा रहा था और... और वो उसके
काफ़ी नज़दीक पहुँच चुका है। ऐसे में उसके दिमाग ने जवाब दे दिया।
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जब कुमार साब ने अपने
दोस्त की कॉलोनी में जाने के लिए सड़क पार करने से पहले दोनों ओर नज़र दौड़ाई तो
रास्ता बिलकुल साफ और सुरक्षित लगा और उन्होने अपना स्कूटर आगे बढ़ा दिया। अभी
रास्ता आधा ही पार किया था कि अपनी बाईं ओर से उन्हें किसी कार की पास आती रौशनी
नज़र आई! खतरे का अंदेशा होते ही वो अपने स्कूटर की गति बढ़ाते कि उन्हें बेहद तेज़
रफ्तार कार की ब्रेक लगती आवाज़ सुनाई दी और फिर...
सुनने वालों ने सुना,
देखने वालों ने देखा, और बताने वालों ने जो बताया... हुआ कुछ यूं।
कानों को चीरती कारों के
ब्रेक की आवाज़! फिर जोरदार टक्कर! भड़ाम!!!
रात का खाना खाकर टहलने
वाले और अपने घरों से निकलकर लोग जब सड़क की ओर दौड़े तो देखा एक स्कूटर सवार टक्कर
के चलते उछला और आगे वाली कार के अगले हिस्से पर आ गिरा। कार चलाने वाले ने भागने
के लिए कार को फिर तेज़ी से आगे बढ़ाने की कोशिश की तो वह घायल स्कूटर सवार साथ-साथ
घिसटता चला गया।
लोगों ने उस कार चलाने
वाले को धर दबोचा और जानलेवा हद तक घायल स्कूटर सवार को ट्रोमा सेंटर पहुंचाया।
उमंग ने जब देखा कि बात
हाथों से निकलती जा रही है तो उसने घबरा के अपनी कार बाईं ओर को लेने की कोशिश की जिससे
कुमार साब पूरी तरह उसकी चपेट में आ गए। और फिर उमंग को यह आवाज़ सुनाई दी,
“भाग, उमंग भाग! वरना बुरी तरह फसेंगे!” और उमंग ने भी बिना एक पल के
लिए यह सोचे कि कार के बोनट पर ही कोई घायल पड़ा है, उसने कार की रफ्तार
बेसाख्ता बढ़ा दी। लेकिन वो बच ना सके। न तो घायल कुमार साब और ना ही उमंग!
कुमार साब को एक मिनट भी
बिना गँवाए चिकित्सकीय सहायता तो मिली; लेकिन उमंग के भागने की कोशिश ने उनकी साँसों पर
पहले ही रोक लगा दी थी और उनके शरीर को इस सहायता से कोई राहत नहीं मिल पाई। कुमार
साब के लिए पूर्ण विराम सिद्ध हुई यह प्राणघातक दुर्घटना उनके परिवार के लिए भी
किसी पूर्ण विराम से कम नहीं साबित हुई। दोनों बच्चे अपनी सालाना परीक्षा में
बैठने की मनःस्थिति में नहीं रहे। और परिवार में रह गईं तीनों महिलाओं के सबसे बड़े
संबल के इस तरह आकस्मिक विछोह ने उन्हें बुरी तरह झकझोर के रख दिया था।
वहीं उमंग को भी अपनी
बेफ़िक्री और ‘कुछ नहीं होता’ वाले नज़रिये के चलते अल्प
विराम का सामना करना ही पड़ा। उसकी कार जब्त कर ली गई। उसका ड्राइविंग लाइसेन्स
आजीवन रद्द कर दिया गया। साथ ही उस पर गैरइरादतन हत्या और सड़क पर लापरवाहीपूर्वक
वाहन चलाने का पुलिस केस भी दर्ज किया गया। वो आज ज़मानत पर रिहा हो अपना जीवन तो जी
रहा है लेकिन इस मामले पर होने वाले अदालती नतीजे की राह तक रहा है जिसके बाद उसके
ऊपर लगा अल्प विराम शायद हटेगा और मुमकिन है कि तब वह एक ज़िम्मेदार नागरिक बन
पाएगा।
और कुमार साब के परिवार को
भी खुद पर लग चुके इस पूर्ण विराम को अल्प विराम बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत करनी
ही होगी और ज़िंदगी में आगे बढ़ना होगा। साथ ही, अपनी भावी पीढ़ी का भविष्य
संवारना भी उनकी ही ज़िम्मेवारी है अब।
सही कहा करते थे कुमार साब,
“दुर्घटनाएँ अपनी नहीं दूसरों की गलतियों का अंजाम हुआ करती हैं...”